पत्रकारिता का स्वरूप बदल चुका है?

नई सदी की शुरुआत है. पत्रकारिता के स्वरूप में भी बदलाव आया है. पत्रकारिता का प्रथम स्वरूप अखबार यानी प्रिंट मीडिया है. फिर टेलीविजन यानी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का दौर आया. आज डिजिटल दौर में यह बिल्कुल नए तेवर और कलेवर के साथ अपनी धमक बनाए हुए है. अख़बार और पत्रिकाओं से शुरू हुई पत्रकारिता अब ऑनलाइन, जिसे वेब-पत्रकारिता कहते है, तक पहुंच चुकी है.

जिस तरह समाज बदला, उसी तरह पत्रकारिता भी बदली. चाहे पत्रकारिता की रूप की बात करें या फिर उसकी विचारधारा की. रिसर्च की ज़रूरत बढ़ गई है . रिसर्च ही है जो पत्रकारिता को अब तक ज़िंदा रखा है. पत्रकारों के नैतिक मूल्य का पता नहीं , लेकिन पत्रकारिता का नैतिक मूल्य रिसर्च पर ही टिका हुआ है.

पहले ख़बरें प्रिंट, रेडियो और टी वी से आती थीं. अब ऑनलाइन भी इसमें शामिल हो गया है. अब वैसी ही ख़बरें आती है,जो दर्शकों को पसंद आए. मतलब दर्शक ही पत्रकारिता को तय कर रहे हैं.

ख़बरें मतलब सूचना. हर कोई जल्दी से जल्दी सूचना पाना चाहता है. इसलिए ऑनलाइन का दरवाज़ा खुला. वैसे सोशल मीडिया जैसे यू ट्यूब, फ़ेसबुक, ट्वीटर, इन्स्टाग्राम बहुत ज़रूरी है. ये सभी बहुत सारी ख़बरें देते हैं, लेकिन मेन स्ट्रीम मीडिया को नकारा नहीं जा सकता है.

डिजिटल का जमाना और पत्रकारिता

कॉलेज और यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता सिखाई जाती है. प्रैक्टिकल कराए जाते हैं. ये पहले भी होता था, लेकिन आज इसकी ज़्यादा ज़रूरत है. वैसे भी मेन स्ट्रीम मीडिया में नौकरी कम है. ऐसे में प्रैक्टिकल स्टूडेंट्स को ऑनलाइन पत्रकार बनने में मददगार है.

आज पत्रकारिता पहले जैसी नहीं रही. अब विशेषज्ञ पत्रकार की ज़रूरत है और मांग भी है. जैसे राजनीतिक पत्रकार, आर्थिक पत्रकार, लीगल पत्रकार, क्राइम पत्रकार, खेल पत्रकार.

पत्रकारिता में पारदर्शिता ज़रूरी है. पत्रकार का काम ही है सवाल पूछना. जवाब देना सरकार का काम है. शायद अब ये सब खोता जा रहा है. पत्रकारों को अपने नैतिक मूल्यों का सम्मान बनाकर रखना चाहिए और समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी भी निभानी चाहिए.

सोशल मीडिया और विश्व पत्रकारिता के नैतिक मूल्य

सोशल मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ अमेरिका में सोशल मीडिया से आनेवाली ख़बरों में 49 फ़ीसदी फ़ेक होती हैं. मतलब फ़ेक न्यूज़ की संख्या बढ़ रही है. साथ ही फ़ैक्ट चेकिंग की मांग बढ़ रही है. भविष्य भी इसी का है. सबसे ज़्यादा नौकरियां भी इसी में हैं.

विश्व सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर में विविधताओं से भरी हैं. विचारधारा में भी विविधता देखी जाती है. विचाराधारा का असर पत्रकारिता पर भी देखी जाती है.

वैसे तो कहते हैं पत्रकारिता की कोई विचारधारा नहीं होती है, लेकिन इसे झलकने में तनिक देर नहीं लगती . सुधार की ज़रूरत है और प्रोफेशनल जर्नलिस्ट की भी बहुत ज़्यादा ज़रूरत है.

मैंने स्नातक वनस्पति विज्ञान, मास्टर राजनीतिक विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय संबंध, एलएलबी की पढ़ाई मुंबई विश्वविद्यालय से की है. इसके साथ ही ब्राॅडकास्ट जर्नलिस्म का कोर्स भी किया है. कानून और राजनीति से लगाव, पर्यावरण से प्रेम और अंतरराष्ट्रीय खबरों में दिलचस्पी है.