निर्वाचन आयोग कितना निष्पक्ष है?

भारत में अब तक 17 आम चुनाव हो चुके हैं.  निर्वाचन आयोग के चुनौतीपूर्ण कार्य को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि निर्वाचन क्षेत्रों में परिसीमन से लेकर निर्वाचन अधिनिर्णय तक के कार्य को आयोग ने कार्यकुशलता, निष्पक्षता और ईमानदारी के साथ संपन्न किया है.

आयोग ने एक समय उत्तराखंड के गढ़वाल में दोबारा मतदान के आदेश दिए और 1989 के लोकसभा चुनाव के दौरान 1235 केंद्रों पर पुनर्मतदान संपन्न कराया.

नौंवी लोकसभा चुनाव के समय निर्वाचन की निष्पक्षता पर कई सवाल खड़े हुए; जैसे- प्रधानमंत्री राजीव गांधी के चुनाव क्षेत्र अमेठी में धाँधली, हिंसा और मतदान केंद्रों पर कब्जे शिकायतों को सही पाने पर भी मात्र 97 मतदान केंद्रों पर ही दोबारा मतदान कराने का निर्णय लिया गया.

अन्य क्षेत्रों से आई शिकायतों पर बिना पुख़्ता जाँच कराए ही आयोग ने दोबारा मतदान कराने के आदेश दिए जबकि अमेठी के जाँच के लिए विशेष दल भेजा गया. सवाल उठता है कि अमेठी के मामले में चुनाव आयोग अलग मानदंड क्यों अपनाया?

अमेठी को विशेष क्षेत्र मानना किसी भी आधार पर न्यायोचित नहीं माना जा सकता. चुनाव आयोग के अध्यक्ष पैरी शास्त्री के सामने गढ़वाल का उदाहरण मौजूद था, अगर वे अमेठी में दोबारा चुनाव का आदेश दे देते तो पहाड़ टूटने वाला नहीं था बल्कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता में भरोसा ही पैदा होता.

इसी तरह प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा बेला पर ₹50 अरब की इंदिरा महिला योजना की घोषणा राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए बनी आचार संहिता का सरासर उल्लंघन था, लेकिन चुनाव आयोग ने इसे मात्र ‘सीमा रेखा उल्लंघन’ माना.

10वीं लोकसभा के निर्वाचन के समय आयोग ने एक समय बिहार सरकार को भयभीत कर दिया. बिहार से ऐसी रिपोर्ट मिली थी कि चुनाव में व्यापक हिंसा और मतदान बूथों पर कब्जा होगा. बिहार सरकार ने एक लाख होमगार्डों को इस आश्वासन के साथ चुनाव बूथों पर नियुक्त किया कि चुनाव के बाद उनकी नौकरी पक्की कर दी जाएगी.

आयोग ने बिहार सरकार को निर्देश दिया कि होम गार्डों को चुनावी ड्यूटी पर नियुक्त न किया जाए. इसी तरह निर्वाचन आयोग ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि 25 मार्च, 1991 के बाद चुनावी प्रक्रिया से सम्बंधित किसी भी अधिकारी का स्थानांतरण न किया जाए. जिन राज्यों ने ऐसा किया उन्हें आयोग ने स्थानांतरण रद्द करने के निर्देश दिए.

बिहार के पटना लोकसभा क्षेत्र में मतदान के दौरान 16 फरवरी, 1998 को बड़े पैमाने पर हुई धाँधली और हिंसा की शिकायतों की जाँच के बाद चुनाव आयोग ने पूरे पटना क्षेत्र का चुनाव रद्द कर दिया. 1996 के लोकसभा चुनावों में भी पटना क्षेत्र में गड़बड़ी की शिकायतें हुई थीं. चुनाव आयोग ने इस चुनाव को भी रद्द कर दिया था.

चुनाव आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत अधिसूचना जारी कर शिवसेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे को 11 दिसंबर, 1995 से 6 वर्ष यानी 10 दिसंबर, 2001 तक के लिए अयोग्य घोषित कर दिया.

नवंबर 2002 में चुनाव आयोग ने विश्व हिंदू परिषद की गोधरा से अहमदाबाद तक की पादशाही यात्रा निकालने पर पाबंदी लगाने के निर्देश दिए. गोधरा के बाद दंगों की पृष्ठभूमि में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनावों के लिए असाधारण सावधानी बरतते हुए आयोग ने विहिप की यात्रा रोकने, बड़े पैमाने पर सुरक्षा बल तैनात करने, अफसरों को बदलने और पक्षपात टालने के लिए आधा निर्वाचन स्टाफ बाहर से लाने जैसे हर संभव उपाय किए.

चुनाव आयोग ने 13वीं लोकसभा चुनावों के प्रचार अभियान में रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडीस को कारगिल युद्ध पर बने एक सरकारी वृत्त चित्र को न दिखाने की चेतावनी दी. प्रधानमंत्री वाजपेयी के साथ विमान पर मीडिया वालों के जाने पर रोक लगाई. 1996 के आम चुनावों के दौरान आचार संहिता के पालन की वजह से दिल्ली किराया क़ानून लागू नहीं किया जा सका.

जनवरी 1998 में निर्वाचन आयोग ने बिहार सरकार को यह कहते हुए राज्य का वर्ष 2000-01 का बजट पेश न करने के निर्देश दिए कि बजट पेश करना आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है. आयोग के निर्देश पर राबड़ी सरकार राज्यपाल के अभिभाषण में प्रमुख नीतिगत घोषणाएँ नहीं करने पर सहमत हो गई. नवंबर 2004 में निर्वाचन आयोग ने अक्टूबर में संपन्न उत्तर प्रदेश के मौनपुरी लोकसभा उपचुनाव को जाँच के बाद रद्द कर दिया.

विपक्षी दलों की पुरजोर माँग के बीच निर्वाचन आयोग ने उत्तर प्रदेश में विभिन्न स्थानों पर हाथी और पार्टी प्रमुख मायावती की मूर्तियाँ ढकने के आदेश 7 जनवरी 2002 को दिए.

फरवरी 2012 में संपन्न उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को लेकर निर्वाचन आयोग सख़्ती से पेश आया. आचार संहिता के मामलों को लेकर सलमान ख़ुर्शीद समेत साढ़े छह लाख मामले दर्ज किए. निर्वाचन आयोग की फटकार के बावजूद भी केंद्रीय क़ानून मंत्री सलमान ख़ुर्शीद द्वारा लगातार मुस्लिम आरक्षण पर दिए जा रहे बयान के मामले ने इतना तूल पकड़ लिया कि इस बयानबाज़ी को आयोग ने संज्ञान में लेते हुए आदर्श आचार संहिता के कथित उल्लंघन के आरोप में ख़ुर्शीद के ख़िलाफ़ राष्ट्रपति को पत्र भेजा और उनके ख़िलाफ़ तत्काल निर्णायक क़दम उठाने की माँग की.

ख़ुर्शीद के बाद 16 फरवरी 2012 को इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने मुस्लिम आरक्षण का कोटा बढ़ाने का बयान देते हुए निर्वाचन आयोग को खुली चुनौती दे डाली.

16 वीं लोकसभा चुनावों के समय चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया कि आठ अधिकारियों को चुनाव ड्यूटी से हटाकर गैर-चुनावी ड्यूटी पर लगाएं. तृणमूल को छोड़कर तमाम राजनीतिक दलों ने इन आठों अधिकारियों पर पक्षपात के आरोप लगाए थे.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शुरुआत में आयोग के निर्देशों का पालन करने के बजाय टकराव की स्थिति उत्पन्न कर दी. निर्वाचन आयोग की कठोर चेतावनी के बाद ही पश्चिम बंगाल सरकार ने आयोग के निर्देशों का पालन किया.

2014 में चुनाव आयोग ने भड़काऊ भाषण देने के आरोप में अमित शाह और आजम खान के भाषण देने पर रोक लगा दी थी. शाह ने उत्तर प्रदेश में कहा था कि यह चुनाव अपमान का बदला लेने का है. आजम ने ग़ाज़ियाबाद की रैली में कहा था कि कारगिल की चोटियाँ हिंदूओं ने नहीं मुसलमानों ने जीती थीं.

17 वीं लोकसभा चुनाव की बात करें तो चुनाव आयोग ने आजम खान, मेनका गांधी, मायावती और योगी आदित्यनाथ के चुनाव प्रचार करने पर रोक लगा दी थी. आयोग ने योगी और आजम खान पर 72 घंटे जबकि मेनका गांधी और मायावती पर 48 घंटे के लिए रोक लगाई थी.

2007 में संपन्न उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में ऐसा पहली बार हुआ जब हिंसा और बूथकैप्चरिंग के आधार पर कोई पुनर्मतदान नहीं किया गया. इन चुनावों में पक्षपात के चार आरोपी मंडलयुक्त, चार डीआईजी, दस ज़िलाधिकारी, सात एसएसपी समेत नीचे के बहुत से अधिकारी हटाए गए. अगर निर्वाचन आयोग निष्पक्ष न होता तो 1977 में इंदिरा गांधी और उनका दल नहीं हारता.

केंद्र में राष्ट्रीय मोर्चा, भाजपा और संयुक्त मोर्चे की सरकार और समय-समय पर विभिन्न राज्यों में गैर-कांग्रेसी दलों का आना निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता का प्रमाण है.

निर्वाचन आयोग के विशेष सलाहकार के.जे राव ने बिहार विधानसभा चुनाव (2005) में ‘सुपर कॉप’ की तरह चुनाव प्रक्रिया की कड़ी निगरानी करके करिश्मा कर दिखाया. असीमित अधिकारों और अर्द्ध-सैनिक बलों की 600 कंपनियों के साथ वे सब करने में सफल रहे जिसमें तेज़तर्रार टी. एन. शेषन भी नाकाम रहे थे.

आयोग ने राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को बिना नंबर प्लेट के वाहन में घूमते धर लिया. मुस्लिम मुख्यमंत्री की पैरवी करने के लिए लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान को नोटिस जारी किया. शरद यादव और नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन पर एफआईआर दर्ज की.

राव के लिए बिहार में चुनाव कराना कश्मीर में चुनाव कराने से अधिक कठिन था. यहाँ आयोग को कई चीजों से लड़ना था- व्यापक हिंसा का डर, फ़र्ज़ी मतदाता और बूथ कब्जे; लिहाजा राव 90,000 अर्द्ध-सैनिक सुरक्षाकर्मियों के कड़क कमांडर बने. पहली बार उन्होंने नेताओं, चुनाव रैलियों, चुनाव प्रचार और मतदान पर निगरानी के लिए 400 डिजिटल कैमरों का इस्तेमाल किया. बिहार के सबसे यादगार चुनावों में से एक था.

पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त मोहिंदर सिंह गिल कहते हैं “निर्वाचन आयोग को सख़्त होना ही पड़ेगा, क्योंकि अब क्षेत्रीय, धार्मिक और जातिगत मुद्दे ज़्यादा जटिल और मुखर हो उठे हैं.”

मैंने स्नातक वनस्पति विज्ञान, मास्टर राजनीतिक विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय संबंध, एलएलबी की पढ़ाई मुंबई विश्वविद्यालय से की है. इसके साथ ही ब्राॅडकास्ट जर्नलिस्म का कोर्स भी किया है. कानून और राजनीति से लगाव, पर्यावरण से प्रेम और अंतरराष्ट्रीय खबरों में दिलचस्पी है.