देश की राजनीति में जाति की भूमिका : वरदान या अभिशाप

भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका का मूल्यांकन करना अत्यंत कठिन कार्य है. कई लोग जाति को राजनीति का कैंसर मानते हैं. जाति प्रथा को राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधक माना जाता है. इससे व्यक्तियों में पृथकतावाद की भावना आती है. राष्ट्रीय हितों और सामाजिक मुद्दों की जगह जातिगत हितों को अधिक महत्त्व देने लगते हैं. देश भर में जातिगत राजनीति ने अपना दबदबा बनाए रखा है.

बिहार चुनाव नज़दीक है. सभी राजनीति दल अपनी-अपनी जाति को परखना शुरू कर चुके हैं. जातिगत राजनीति पर जयप्रकाश नारायण ने कहा है,

“जाति भारत में अत्यधिक महत्वपूर्ण दल है.”

भारतीय स्वतंत्रता के बाद से ही देश में राजनीतिक आधुनिकीकरण प्रारंभ हो गया. यह धारणा विकसित हुई कि पश्चिमी राजनीतिक संस्थाएं और लोकतांत्रिक मूल्यों को अपनाने के बाद राजनीति में जातिवाद का अंत हो जाएगा. इसके उटल जातिगत का प्रभाव बढ़ता ही गया.

हमारे राजनीतिज्ञ एक अजीब असमंजस की स्थिति में हैं. जहां एक ओर वे जातिगत भेदभाव मिटाने की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर जाति के आधार पर वोट बटोरने की कला में निपुणता हासिल है. देश के किसी भी राज्य की राजनीति जातिगत राजनीति से अछूती नहीं है.

जातिगत नेताओं की शुरुआत 1989 में मंडल कमीशन के वक़्त होने लगी. 1991 के बाद जो बड़े नेता जैसे लालूप्रसाद यादव, नीतीश कुमार, मायावती, मुलायम सिंह, शिवराज सिंह चौहान, शरद यादव आए, वे जाति आधारित राजनीति के प्रतिनिधि बन गए. ऐसा भी कहा जाता है कि जितने भी निम्न जाति के नेताओं का जन्म हुआ, यह मंडल कमीशन की ही देन है.

प्रो. रजनी कोठारी की लिखी ‘ कास्ट इन इंडियन पॉलिटिक्स’ में भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका का विस्तृत विश्लेषण है. इस किताब के मुताबिक़ राजनीति में जाति का आना उचित है. इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ी है. इससे पहले ऊंची जाति यानी ब्रह्मणों का दबदबा रहता था.

रजनी कोठारी का मत है कि अक्सर यह प्रश्न पूछा जाता है कि क्या भारत में जाति प्रथा ख़त्म हो रही है? इस सवाल के पीछे यह धारण है कि मानो जाति और राजनीति परस्पर विरोधी संस्था हैं. ज़्यादा सही सवाल यह होगा कि जाति-प्रथा पर राजनीति का क्या प्रभाव पड़ रहा है और जाति वाले समाज में राजनीति क्या रूप ले रही है?

जो लोग राजनीति में जातिवाद की शिकायत करते हैं, वे न राजनीति के प्रकृत स्वरूप को ठीक से समझ पाए हैं और न जाति के स्वरूप को. भारत की जनता जातियों के आधार पर संगठित है. इसलिए न चाहते हुए भी राजनीति को जाति संस्था का उपयोग करना ही पड़ेगा. यह कहा जा सकता है कि राजनीति में जातिवाद का मतलब जाति का राजनीतिकरण है.

जाति को अपने दायरे में खींचकर राजनीति उसे अपने काम में लाने का प्रयत्न करती है. दूसरी ओर राजनीति द्वारा जाति या बिरादरी को देश की व्यवस्था में भाग लेने का मौक़ा मिलता है. राजनीतिक नेता सत्ता प्राप्त करने के लिए जातीय संगठन का उपयोग करते हैं और जातियों के रूप में उनको बना-बनाया संगठन मिल जाता है, जिससे राजनीतिक संगठन में आसानी होती है.

रजनी कोठारी के उलट सोच रखने वाले हेरल्ड गोल्ड का कहना है कि राजनीति का आधार होने की बजाय जाति उसको प्रभावित करने वाला एक तत्व है.

माइकल ब्रेचर के मुताबिक़ अखिल भारतीय राजनीति की अपेक्षा राज्य स्तर की राजनीति पर जातिवाद का अधिक प्रभाव है. बिहार, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा, राजस्थान और महाराष्ट्र राज्यों की राजनीति का अध्ययन तो बिना जातिगत गणित के विश्लेषण के कर ही नहीं सकते.

बिहार की राजनीति में राजपूत, ब्राह्मण, कायस्थ और जनजाति प्रमुख जातियां हैं. केरल में साम्यवादियों की सफलता का राज यही है कि उन्होंने ‘इजावाहा’ जाति को अपने पीछे संगठित कर लिया. आन्ध्र प्रदेश की राजनीति में काम्मा और रेड्डी जातियों का संघर्ष की कहानी है. काम्मओं ने साम्यवादियों का समर्थन किया तो रेड्डी जाति ने कांग्रेस का.

महाराष्ट्र की राजनीति में मराठों, ब्रह्मणों और महरों में प्रतिस्पर्धा रही है. गुजरात की बात करें तो दो जातियां-पाटीदार और क्षत्रिय का प्रभाव है.

डी.आर गाडगिल कहते हैं “क्षेत्रीय दबावों से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक बात यह है कि वर्तमान समय में जाति व्यक्तियों को एकता के सूत्र में बाधने में बाधक सिद्ध हुई है.”

प्रसिद्ध समाजशास्त्री एम.एन.श्रीनिवास का स्पष्ट कहना है कि परंपरावादी जाति व्यवस्था ने प्रगतिशील और आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था को इस तरह प्रभावित किया है कि ये राजनीतिक संस्थाएं अपने मूलरूप में कार्य करने में समर्थ नहीं रही हैं.

दूसरी तरफ़ अमेरिकी लेखक रूडोल्फ़ का कहना है कि जाति व्यवस्था ने जातियों के राजनीतिकरण में सहयोग देकर परंपरावादी व्यवस्था को आधुनिकता में ढालने के सांचे का कार्य किया है. वे लिखते हैं,

“अपने परिवर्तिति रूप में जाति व्यवस्था ने भारत में कृषक समाज में प्रतिनिधिक लोकतंत्र की सफलता तथा भारतीयों की आपसी दूरी को कम करके, उन्हें अधिक समान बनाकर समानता के विकास में सहायता दी है.”

चाहे जाति आधुनिकीकरण के मार्ग में बाधक न हो, लेकिन राजनीति में जाति का हस्तक्षेप लोकतंत्र की धारणा के प्रतिकूल है. जातिवाद देश, समाज और राजनीति के लिए बाधक है. विविधता की सीमाएं होती हैं.

इस देश में इतनी जातियां, उपजातियां और सहजातियां पैदा हो गई हैं कि वे एक-दूसरे से अलग रहने में ही अपने-अपने अस्तित्व की रक्षा समझती हैं. यह अलग रहने की सोच ही राष्ट्रीय एकता के लिए घातक है.

मैंने स्नातक वनस्पति विज्ञान, मास्टर राजनीतिक विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय संबंध, एलएलबी की पढ़ाई मुंबई विश्वविद्यालय से की है. इसके साथ ही ब्राॅडकास्ट जर्नलिस्म का कोर्स भी किया है. कानून और राजनीति से लगाव, पर्यावरण से प्रेम और अंतरराष्ट्रीय खबरों में दिलचस्पी है.